हनुमान चालीसा का इतिहास बहुत ही रोचक और आध्यात्मिक महत्व से भरा हुआ है। यह एक प्रसिद्ध हिंदू भक्ति काव्य है, जिसकी रचना 16वीं शताब्दी में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। इसे अवधी भाषा में लिखा गया है, जो उस समय उत्तर भारत में बोली जाने वाली एक लोकप्रिय भाषा थी। हनुमान चालीसा भगवान हनुमान की स्तुति में रचित है, जो रामायण में भगवान राम के परम भक्त और सहायक के रूप में जाने जाते हैं।
हनुमान चालीसा की उत्पत्ति और रचना
तुलसीदास का जन्म 1511 ईस्वी (कुछ विद्वानों के अनुसार 1532) में हुआ था और वे अपने जीवनकाल में भगवान राम के प्रति गहरी भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना “रामचरितमानस” है, जो रामायण का अवधी भाषा में रूपांतरण है। हनुमान चालीसा को तुलसीदास ने अपने जीवन के एक विशेष संदर्भ में लिखा था।
ऐसा माना जाता है कि तुलसीदास को हनुमान जी के दर्शन हुए थे, जिसने उन्हें इस रचना के लिए प्रेरित किया। एक किंवदंती के अनुसार, जब तुलसीदास काशी (वाराणसी) में थे, उन्हें एक संकट का सामना करना पड़ा। उस समय उन्होंने हनुमान जी की प्रार्थना की, और हनुमान ने उनकी रक्षा की। इस घटना से प्रभावित होकर तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की, जिसमें हनुमान की शक्ति, भक्ति और राम के प्रति उनकी निष्ठा का गुणगान किया गया।
रचना का स्वरूप
हनुमान चालीसा में दो दोहे (प्रारंभ और अंत में) और 40 चौपाइयाँ (चालीस छंद) हैं, इसलिए इसे “चालीसा” कहा जाता है। यह रचना सरल भाषा में लिखी गई है, ताकि आम जन इसे आसानी से गा सकें और समझ सकें। इसमें हनुमान के गुणों, उनके बल, बुद्धि, और राम के प्रति समर्पण का वर्णन है। साथ ही, यह भक्तों को संकट से मुक्ति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना भी है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
हनुमान चालीसा का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी है। यह मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन का एक हिस्सा थी, जिसमें तुलसीदास जैसे संतों ने ईश्वर की भक्ति को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। यह उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में लोगों के लिए आशा और विश्वास का स्रोत बनी।
हनुमान को शक्ति, साहस और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है, और चालीसा के माध्यम से भक्त उनकी इन शक्तियों को अपने जीवन में आमंत्रित करते हैं। इसे नियमित रूप से पढ़ने या गाने की परंपरा आज भी भारत और विश्व भर में हिंदू समुदाय में प्रचलित है। खास तौर पर मंगलवार और शनिवार को, जो हनुमान जी के दिन माने जाते हैं, इसे पढ़ा जाता है।
किंवदंतियाँ और प्रभाव
एक अन्य कथा के अनुसार, तुलसीदास ने हनुमान चालीसा को मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान लिखा था। कहा जाता है कि अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और उनसे चमत्कार दिखाने को कहा। तुलसीदास ने हनुमान की शक्ति का आह्वान किया, और हनुमान की कृपा से वे उस संकट से बच गए। हालाँकि, इस कथा की ऐतिहासिकता पर विद्वानों में मतभेद है।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता
आज भी हनुमान चालीसा का पाठ लाखों लोगों द्वारा किया जाता है। इसे संकट से मुक्ति, रोग निवारण और मन की शांति के लिए पढ़ा जाता है। इसके छंदों में निहित शक्ति और भक्ति ने इसे समय के साथ और भी लोकप्रिय बनाया है। इसे विभिन्न भाषाओं में अनुवादित किया गया है और कई संगीतमय प्रस्तुतियाँ भी उपलब्ध हैं।
Hanuman Chalisa Lyrics in Hindi
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुँचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
शंकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचन्द्र के काज संवारे॥
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्री रघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोज पर भानु।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै॥
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंधि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंझ मेरा॥
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥